?(सुखी जीवन के लिए उपयोगी संदेश) नामक पुस्तक का सारांश?

लेखकः

अब्दुर्रह़मान बिन नास़िर अस्सादी (1307 – 1376 हिजरी)

(यह अपने युग के प्रकांड मुस्लिम विद्वान एवं प्रसिद्ध अन्वेषी थे)

इस पुस्तक के लेखन का कारणः

जब शैख़ रह़िमहुल्लाह ने उपचार के उद्देश्य से सन 1373 हिजरी में लेबनान की यात्रा की थी तो वहाँ उन्होंने डेल कार्नेगी नामक अमेरिकी लेखक की एक पुस्तक का अध्यन किया था जिसका शीर्षक था (चिंता छोड़ो सुख से जियो), यह पुस्तक उन्हें बहुत पसंद आई, अतः इसी को सामने रख कर उन्होंने यह पुस्तक लिखी)।

  1. अल्लाह तआला पर ईमान रखना एवं नेक अमल -सदकर्म- करना (क्योंकि अल्लाह पर ईमान रखना अल्लाह की ओर से मुक़द्दर की गई चीज़ों पर सब्र करने, सहमत होने तथा संतोष करने के लिए प्रेरित करता है)।
  2. कर्म एवं वक्तव्य के द्वारा जीव-जंतु पर एह़सान व उपकार करना (क्योंकि भलाई करने वालों को भलाई मिलती है, तथा बुराई भी उनसे दूर होती है)।
  3. लाभदायक ज्ञान अथवा कर्तव्य में लीन रहना (क्योंकि स्वयं को व्यस्त रखने से मन को उन चीज़ों के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिलता है जो आपको व्यथित करें)।
  4. आज क्या करना है इस पर ध्यान केंद्रित करें (जो बीत गया उसकी चिंता न करें, और जो आने वाला है उसके लिए व्याकुल न हों, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम चिंताजनक एवं दुःख दायक चीज़ों से अल्लाह की शरण मांगा करते थे)।
  5. अधिकाधिक अल्लाह तआला का स्मरण व ज़िक्र करना (क्योंकि अल्लाह का स्मरण करना दिल की शांति एवं उसको चिंतामुक्त बनाने का कारण है)।
  6. अल्लाह तआला की स्पष्ट एवं छिप्त नियामतों का शुमार करना (क्योंकि यह आपके अंदर शुक्र एवं धन्यवाद का भाव उत्पन्न करेगा जो चिंताओं को भूल जाने का कारण बनेगा)।
  7. अपने से नीचे वालों को देखना (क्योंकि इससे आपके पास जो कुछ है उस पर अल्लाह का शुक्र अदा करने का भाव आपके मन में उत्पन्न होगा, और यह आपकी चिंताओं एवं दुखों को दूर कर देगा)।
  8. जो बीत गया उसको भूल जाना (क्योंकि जो बीत गया उसको वापस लाना असंभव है, अतः उसके विषय में चिंता करना,  बेकार बात एवं पागलपन है)।
  9. अल्लाह तआला से अनवरत दुआ करते रहना (जैसे यह दुआ करे किः अल्लाह तआला उसके दीन, दुनियाँ एवं आख़िरत (धर्म, लोक एवं परलोक) को सुधार दे, जैसाकि ह़दीस़ में वर्णित है।
  10. इससे भी बुरी स्थिति की कल्पना करें (आपदा के समय इससे भी बुरी स्थिति में पड़ जाने की कल्पना करे, इससे उस समय वाली आपदा उसको हल्की लगने लगेगी, और जब कोई आपदा आ जाए तो उसको दूर करने का हरसंभव प्रयास करे)।
  11. भ्रम, वहम एवं बेकार चिंताओं से दूर रहना (क्योंकि वहम आपके अंदर बुरे विचार का संचार करता है, जिससे व्यक्ति किसी अन्होनी की आशंका से व्याकुल हो जाता है, ज्ञात हो कि यह दुखों एवं रोगों का एक बड़ा कारण है)।
  12. हार्दिक रूप से पूरी तरह अल्लाह पर तवक्कुल, भरोसा एवं एतमाद करना (अल्लाह तआला का फ़रमान हैः  { ﲗ ﲘ ﲙ ﲚ ﲛ ﲜﲝ } जो अल्लाह पर निर्भर रहेगा तो अल्लाह उसके लिए पर्याप्त होगा) सूरह त़लाक़ः 3 ।
  13. दूसरों की गलतियों को बरदाश्त करना एवं उस पर संयम बरतना सीखें (क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई ऐसा ऐब, कमी, त्रुटि या कोई ऐसी चीज़ अवश्य होगी जो आपको अप्रिय होगी, अतः उसको छोड़ कर उसकी अच्छाइयों की ओर ध्यान केंद्रित करें)।
  14. निरर्थक एवं बेकार बातों में स्वयं को व्यस्त रखने से दूर रहें (क्योंकि जिस प्रकार से आप बड़े मामलों से बचने के लिए स्वयं को बौद्धिक एवं शारीरिक रूप से तैयार रखते हैं, उसी प्रकार छोटी बातों की ओर ध्यान देने की भी कोई आवश्यकता नहीं है)।
  15. जीवन बहुत छोटा है (वास्तविक जीवन -अल्प होने के बावजूद- वह जीवन है जिसमें सुख चैन का समावेश हो, अतः इसे चिंता एवं दुःख में पड़ कर और अधिक छोटा न करें)।
  16. चिंता के बहुतेरे कारणों में यदि गहन विचार किया जाए तो पता चलेगा कि वास्तव में ये चिंता का कारण हैं ही नहीं (क्योंकि बहुत सी संभावनाएं जिनके विषय में सोच-सोच कर आप परेशान रहता है वो घटित ही नहीं होती हैं, अतः उन बड़ी चिंताओं को पछाड़ने के लिए आप के पास यदि एक क्षीण आशा भी हो तो उसको तुच्छ न समझें)।
  17. लोगों की ओर से मिलने वाली परेशानियों पर दुखी न हों (क्योंकि लोगों से जो दुख आपको मिलता है वास्तव में वह उस को ही चोट पहुँचाने वाला होता है, किंतु जब आप उसमें व्यस्त हो जाएंगे तो यह आपको भी उसी प्रकार से हानि पहुँचाएगा जिस प्रकार से यह उन्हें हानि पहुँचाता है)।
  18. आपका जीवन आपके विचार के अधीन है (यदि आप ऐसी चीज़ों के बारे में विचार-विमर्श करते हैं जिससे आपको लोक परलोक दोनों में लाभ हो तब तो आपका जीवन सुखमय जीवन है, अन्यथा इसके विपरीत आपका जीवन दुखमय जीवन होगा)।
  19. लोगों के शुक्रिया एवं धन्यवाद की आशा तथा प्रतीक्षा न करें (यदि आपने किसी व्यक्ति पर उपकार किया है चाहे उसका अधिकार आप पर था अथवा नहीं, तो यह आपने अल्लाह की ख़ातिर किया है, अतः लोगों से धन्यवाद की अपेक्षा न करें)।
  20. स्वयं को ऐसी चीज़ों में व्यस्त रखें जो आप के लिए लाभदायक हों (क्योंकि हानिकारक चीज़ें आपको दुःख एवं चिंता में डालती हैं, अतः अल्लाह से सहायता माँगते हुए स्वयं को लाभदायक चीज़ों में व्यस्त रखें)।
  21. आज का काम कल पर न डाल (क्योंकि यदि आप अपने कर्त्वयों का त्वरित निर्वहन नहीं करते हैं तो पिछले कार्यों का आपके पास ढ़ेर तो लगेगा ही आने वाले कार्यों का जमावड़ा भी आपके पास लग जाएगा)।
  22. अपनी प्राथमिकताएं तय करें (अतः सर्वप्रथम श्रेष्ठतम तत्पश्चात श्रेष्ठ अर्थात सबसे पहले अति महत्वपूर्ण फिर महत्वपूर्ण, इस प्रकार अपनी प्राथमिकताए तय कर लें, और उस चीज़ से प्रारंभ करें जिसको आप पसंद करते हैं ताकि आप काहिली एवं आलस्य का शिकार न हों, एवं मशवरा करें क्योंकि अरबी में एक कहावत हैः “जिसने परामर्श किया वह कभी लज्जित नहीं हुआ”)।